Wednesday, June 3, 2009

अरे चन्दा तेरी निरमल कहिए चाँदनी,

अरे चन्दा ! 
तेरी निरमल कहिए चाँदनी, 
राजा की बेटी पानी नीकरी

अरे कुँअटा! तेरे ऊँचे-नीचे घाट रे, 
जा ऊपर धोवै छोरा धोवती

अरे छोरा! तू मारू बैंगन तोरिला 

जौं लौ मैं धोऊँ तेरी धोवती

अरे छोरी! तेरे गोबर लिसरे हाथ रे, 
दाग लगैगो मेरी धोवती

अरे छोरा!
मेरे मेंहदी रचि रहे हाथ रे, 
रंग चुयेगी तेरी धोवती

अरे छोरा! तू मन को बड़ो मलूक रे, 
इत्ते बड़े पै क्वाँरो चौं  रह्यौ   ?

अरे छोरी!
मेरे मरि गए माई बाप रे, 
भैया भरोसे क्वाँरे हम रहे

अरे छोरी!
तू मन की बड़ी मलूक री, 
इतनी बड़ी तौ क्वाँरी चौं रही?

अरे छोरा! वर देखे देश-विदेश में, 
मेरी जोड़ी को वर ना मिल्यौ

अरे छोरी! चल चल तू सोरों घाट री, 
ह्वाँ चलिके डारें दोनों भाँवरी

अरे छोरा! वहाँ बहुत जुरैंगे लोग रे, 
मोहि तो आवै देखौ लाज री।

ब्रजभाषा का एक लोकप्रिय लोक गीत



16 comments:

  1. welcome......likhte rahiye...aisi hi achhi rachnaye...

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  2. मेरे हिन्दी अध्यापक ब्रजभाषा के माधुर्य का यह उदाहरण दिया करते थे' "माई री मोहिं साँकरी गरी में काँकरी गरत हौ"।

    आशा है आप ऐसी ही मधुर रचनाएँ पठाते रहे
    गें। शुभकामनाएँ।

    यदि word verification का झंझट रखा हो तो हटा दें बहुत कष्ट देता है।

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  3. आनंद..अनोखी सी तृप्ति...
    क्या खूब संवाद...

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  4. छोरा अउर छोरी, डा़रे दोनो भांवरी.
    और लोकगीतों की प्रतीक्षा रहेगी।

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  5. प्रिय बहन
    जय हिंद
    लोकगीत बहुत अच्छा लगा
    अगर आप अपने अन्नदाता किसानों और धरती माँ का कर्ज उतारना चाहते हैं तो कृपया मेरासमस्त पर पधारिये और जानकारियों का खुद भी लाभ उठाएं तथा किसानों एवं रोगियों को भी लाभान्वित करें

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  6. आज आपका ब्लॉग देखा..... अच्छा लगा. मेरी कामना है की आपके शब्दों को नयी ऊर्जा मिले जिससे वे जन-सरोकारों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन सकें..
    कभी समय निकाल कर मेरे ब्लॉग पर भी आयें :-
    http://www.hindi-nikash.blogspot.com

    सादर-
    आनंदकृष्ण, जबलपुर
    मोबाइल : 09425800818

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  7. जब भी कोई बात डंके पे कही जाती है
    न जाने क्यों ज़माने को अख़र जाती है ।

    झूठ कहते हैं तो मुज़रिम करार देते हैं
    सच कहते हैं तो बगा़वत कि बू आती है ।

    फर्क कुछ भी नहीं अमीरी और ग़रीबी में
    अमीरी रोती है ग़रीबी मुस्कुराती है ।

    अम्मा ! मुझे चाँद नही बस एक रोटी चाहिऐ
    बिटिया ग़रीब की रह – रहकर बुदबुदाती है

    ‘दीपक’ सो गई फुटपाथ पर थककर मेहनत
    इधर नींद कि खा़तिर हवेली छ्टपटाती है ।
    @Kavi Deepak Sharma
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  8. namaskar mitr,

    aapki saari posts padhi , aapki kavitao me jo bhaav abhivyakt hote hai ..wo bahut gahre hote hai .. aapko dil se badhai ..

    meri nayi kavita " tera chale jaana " aapke pyaar aur aashirwad ki raah dekh rahi hai .. aapse nivedan hai ki padhkar mera hausala badhayen..

    http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html

    aapka

    Vijay

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  9. आपकी इस रचना के बारे में क्या कहूं.......
    बहुत ही उक्रष्ट रचना है.....
    बहुत ही अच्छे भावः प्रकट किये हैं आपने.......

    अक्षय-मन

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  10. बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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